Showing posts with label Hindi Poem. Show all posts
Showing posts with label Hindi Poem. Show all posts

Saturday, December 9, 2017

जाड़े की धूप
---------------

जाड़े का महीना
कनकनाती सर्दी
ऐसे में
किसी कोने से कोहरे को चीरती हुई
सुनहरे रंग की धूप का आगमन
हल्की सी झिन-झीनी सी|
जिसे देखते मन खिल उठा
और कह उठा
आहा धूप आगयी
बच्चे खिलखिला उठे
घर में उल्लास सा भर उठा
पेड़ पौधे मानो खुशी से झूम उठे
चिड़ियों की ची ची ने मन को प्रफुलित कर दिया
और मन अनायास ही कह उठा
वाह री जाड़े की  धूप
तू तो धन्य हैं,
जो इस कपकपाहट में
इस धरा के चर अचर जीवो में
प्राण का संचार कर दिया
तुझे नमन, स्नेह|
तू सुनहरी तेरा दिन सुनहरा
देख तेरी मातृमयी स्नेह ने
इस मृत्य प्राय संसार में प्राण भर दिया
जाड़े की धूप, ओ जाड़े की धूप |

Sunday, September 20, 2015

Aur tum kah rahe ho ki-

और तुम कह रहे हो मैं लड़खड़ा रहा हूँ

मुझे पता हैं क्यू धूल उड़ रही हैं
मुझे पता हैं किधर आँधी चल रही हैं
मैं गिरा नहीं हूँ, मैं लड़खराया भी नहीं हूँ
मैं  धरा  पर ही खड़ा हूँ और सीधें चल रहा हूँ
और तुम कह रहे हो मैं लड़खड़ा गया  हूँ - 1

तुम्हे शायद भ्रम हुआ हैं
तुमसे शायद ग़लती हुई हैं
तुम शायद भटक गये हो अपने आकलन में

देखो-

मैं ज़मीन पर ही खड़ा हूँ
मैं ज़मीन पर ही खड़ा हूँ

अपनी मंज़िल से ना भटका हूँ
ना मैं रुका हूँ, ना मैं टूटा हूँ|
और तुम कह रहे हो मैं लड़खड़ा गया हूँ - 2


सुनो-

आँधी मेरा रास्ता रोक सकती नहीं
पाषाण मेरा रास्ता मोड़  सकता नहीं
मैने पहले भी आँधियों को रोका  हैं
मैने पहले भी पाषाण को चटकाया हैं
तुम किसी ग़लतफमी में ना रहो
मैं धरा पर ही खड़ा हूँ और सीधे चल रहा हूँ
और तुम कह रहे हो मैं लड़खड़ा गया हूँ - 3
                               ~शलभ

Saturday, February 15, 2014

Poem dedicated to HIM who dwell in everything in this Universe



I just wrote below poem on Almighty..O lord at Thy lotus feet:



हे परमपिता! तुम सर्वव्यापी
तुम कालजयी, तुम अविनाशी!!
स्वर्णिम किरणें उषा की
जब छा जाती क्षितिज पर, पत्तो पर
एक नव-जीवन, नव-स्फूर्ति का
एहसास सा होता कन कन में
छा जाता नव-उल्लास कन कन में
होता प्राणो का संचार इस धरा पर
तुम उषा, तुम किरण, तुम इस धरा के कन कन में


हे परमपिता! तुम सर्वव्यापी
तुम कालजयी, तुम अविनाशी!!

तुम सदृशय, तुम अदृश्य
तुम ज़रा, तुम अजरा
तुम पारा, तुम अपरा
तुम भोग, तुम करता
तुम माया, तुम अमाया
तुम साकार, तुम निराकार
तुम अगम्य, तुम अगोचर
तुम रहस्य, तुम अरहस्य

हे परमपिता! तुम सर्वव्यापी
तुम कालजयी, तुम अविनाशी!!
हम निर्जीव, हम शून्यांश
करे वंदन तुम्हारी
तुम शब्द्द, तुम लेखनी
तुम विचार, तुम कविता
तुम हर क्षण!! श्वास पर-श्वास
हे शरणागत! हम शरणागत
करे सर्वस्य तुझको अर्पण

हे परमपिता! तुम सर्वव्यापी
तुम कालजयी, तुम अविनाशी!!